वांछित मन्त्र चुनें

उदायु॑षा॒ समायु॒षोदोष॑धीनां॒ रसे॑न। व्यहं सर्वे॑ण पा॒प्मना॒ वि यक्ष्मे॑ण॒ समायु॑षा ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत् । आयुषा । सम् । आयुषा । उत् । ओषधीनाम् । रसेन ।वि । अहम् । सर्वेण । पाप्मना । वि । यक्ष्मेण । सम् । आयुषा ॥३१.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:31» पर्यायः:0» मन्त्र:10


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

आयु बढ़ाने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (आयुषः) जीवन [उत्साह] के साथ (उत्=उद्भव) खड़ा हो (आयुषा) जीवन के साथ (सम्=सम् भव) पराक्रमी हो। (ओषधीनाम्) औषधियों अन्न आदि के (रसेन) रस [भोग] से (उत्=उद्भव) ऊँचा हो। (अहम्) मैं (सर्वेण पाप्मना) सब कर्म से... [म० १] ॥१०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य जीवन भर उद्योगी तथा पराक्रमी रहे, और अन्न आदि पदार्थों के भोगों के अनुसार उपकार का प्रतिफल देकर जीवन सुफल करे ॥१०॥ इस मन्त्र में भव पद की अनुवृत्ति मन्त्र ९ से आती है ॥
टिप्पणी: १०−(उत्) अत्र पूर्वमन्त्राद् भव इति क्रियापदम् अनुवर्तते। उद्भव ऊर्ध्वो वर्तस्व। (आयुषा) जीवनेन। उत्साहेन। (सम्) सम्भव। पराक्रमी भव। (ओषधीनाम्) अ० ३।५।१। व्रीहियवादीनाम्। (रसेन) आयुष्करेण सारेण। अन्यत् स्पष्टम् ॥