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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परस्पर मेल का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भ्राता) भ्राता (भ्रातरम्) भ्राता से (मा द्विक्षत्) द्वेष न करे (उत) और (स्वसा) बहिन (स्वसारम्) बहिन से भी (मा) नहीं। (सम्यञ्चः) एक मत वाले और (सव्रताः) एकव्रती (भूत्वा) होकर (भद्रया) कल्याणी रीति से (वाचम्) वाणी (वदत) बोलो ॥३॥
भावार्थभाषाः - भाई-भाई, बहिन-बहिन और सब कुटुम्बी नियमपूर्वक मेल से वैदिक रीति पर चलकर सुख भोगें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(भ्राता) अ० १।१४।२। भ्राजते यः। सहोदरः। (मा द्विक्षत्) मा द्विष्यात्। (स्वसारम्) अ० १।२८।४। भगिनीम्। (सम्यञ्चः)। ऋत्विग्दधृक्०। पा० ३।२।५९। इति सम्+अञ्चू गतिपूजनयोः-क्विन्। समः समि। पा० ६।३।९३। इति समि इत्यादेशः। समञ्चनाः सङ्गताः। समानज्ञानाः। सम्यक् पूजनशीलाः। (सव्रताः) सहकर्माणः। (वाचम्) वाणीम्। (वदत) कथयत। (भद्रया) कल्याण्या रीत्या। अन्यत् स्पष्टम् ॥
