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इरे॑व॒ नोप॑ दस्यति समु॒द्र इ॑व॒ पयो॑ म॒हत्। दे॒वौ स॑वा॒सिना॑विव शिति॒पान्नोप॑ दस्यति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इराऽइव । न । उप । दस्यति । समुद्र:ऽइव । पय: । महत् । देवौ । सवासिनौऽइव । शितिऽपात् । न । उप । दस्यति ॥२९.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:29» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से सुख पाता है।

पदार्थान्वयभाषाः - (शितिपात्) प्रकाश और अन्धकार में गतिवाला परमेश्वर (इरा इव) भूमि वा विद्या के समान और (समुद्रः) समुद्र, अर्थात् (महत्) बड़े (पयः इव) जलराशि के समान (न) नहीं (उप दस्यति) घटता है, और (देवौ) दिव्य गुणवाले (सवासिनौ इव) साथ-साथ निवास करनेवाले दोनों [प्राण और अपना वा दिनरात] के समान वह (न) नहीं (उप दस्यति) घटता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे भूमि, विद्या, जल, वायु आदि उचित प्रयोग से अधिक-अधिक उपकारी होते हैं, इसी प्रकार ईश्वर का उपकारी कोश विज्ञान द्वारा मनुष्य को बढ़ाता चला जाता है ॥६॥
टिप्पणी: ६−(इरा) ऋज्रेन्द्राग्रवज्र०। उ० २।२८। इति इण् गतौ-रक्। अथवा, इं कामं सुकामनां राति ददाति। रा दाने-क। टाप्। भूमिः। वाक्। विद्या (नोपदस्यति) म० २। नोपक्षीयते (समुद्रः) जलधिः। अन्तरिक्षं वा (पयः) जलौघः (महत्) विशालम् (देवौ) दिव्यगुणयुक्तौ (सवासिनौ) सह समानं वा निवसन्तौ। अश्विनौ प्राणापानौ। अन्यद् व्याख्यातम् ॥