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सर्वा॒न्कामा॑न्पूरयत्या॒भव॑न्प्र॒भव॒न्भव॑न्। आ॑कूति॒प्रोऽवि॑र्द॒त्तः शि॑ति॒पान्नोप॑ दस्यति ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सर्वान् । कामान् । पूरयति । आऽभवन् । प्रऽभवन् । भवन् । आकूतिऽप्र: । अवि: । दत्त: । शितिऽपात् । न । उप । दस्यति ॥२९.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:29» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से सुख पाता है।

पदार्थान्वयभाषाः - (आकूतिप्रः) संकल्पों का पूरा करनेवाला, [आत्मा को] (दत्तः) दिया हुआ, (शितिपात्) प्रकाश और अप्रकाश में गतिवाला (अविः) रक्षक प्रभु (आभवन्) व्यापक, (प्रभवन्) समर्थ और (भवन्) वर्तमान होता हुआ (सर्वान्) कामान् तब सुन्दर कामनाओं को (पूरयति) पूरा करता है, और (न) नहीं (उपदस्यति) घटता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - उस सर्वशक्तिमान् परमात्मा का इतना बड़ा कोश है कि सब सृष्टि की शुभ कामनाओं को पूरा करते-करते भी भरपूर ही बना रहते हैं ॥२॥ बृहदारण्यकोपनिषद में पाठ है−पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ बृहदा० ५।१।१ ॥ ओ३म्। वह [ब्रह्म] पूर्ण [भरपूर] है, यह [जगत्] पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण उदय होता है, पूर्ण से पूर्ण लेकर पूर्ण ही बच रहता है ॥२॥
टिप्पणी: २−(सर्वान्) समस्तान् (कामान्) शुभाभिलाषान् (पूरयति)। संपूर्णान् करोति (आभवन्) भू सत्तायां व्याप्तौ च-शतृ। आ समन्ताद् भवन् व्याप्नुवन् (प्रभवन्) समर्थः प्रबलः सन् (भवन्) वर्त्तमानः सन् (आकूतिप्रः) आकूति+प्रा पूरणे-क। संकल्पपूरकः (नोपदस्यति) दसु उपक्षये। नोपक्षीयते। अपितु वर्धते। अन्यद् गतं म० १ ॥