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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
उत्तम नियम से सुख होता है।
पदार्थान्वयभाषाः - (इह) यहाँ पर (पुष्टिः) पुष्टि, और (इह) यहाँ पर ही (रसः) रस होवे। (यमिनि) हे उत्तम नियमवाली बुद्धि ! (इह) यहाँ पर (सहस्रसातमा) अत्यन्त करके सहस्रों प्रकार से धन देनेवाली (भव) हो, और (पशून्) व्यक्त और अव्यक्त वाणीवाले जीवों को (पोषय) पुष्ट कर ॥४॥
भावार्थभाषाः - उत्तम नियम युक्त बुद्धि से मनुष्य अनेक प्रकार की वृद्धि और दूध, घी, आदि रस और बहुत सा धन पाकर सब जीवों की रक्षा करता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(पुष्टिः) वृद्धिः। समृद्धिः (रसः) क्षीरदुग्धादिरूपः (सहस्रसातमा) जनसनखनक्रमगमो विट्। पा० ३।२।६७। इति सहस्र+षणु दाने-विट्। विड्वनोरनुनासिकस्यात्। प० ६।४।४१। इति आत्त्वम्। अतिशायने तमबिष्ठनौ। प० ५।३।५५। इति तमप्। टाप्। अतिशयेन सहस्रधनस्य दात्री (पोषय) समेधय। अन्यद् व्याख्यातं म० १ ॥
