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या प्ली॒हानं॑ शो॒षय॑ति॒ काम॒स्येषुः॒ सुसं॑नता। प्रा॒चीन॑पक्षा॒ व्यो॑षा॒ तया॑ विध्यामि त्वा हृ॒दि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या । प्लीहानम् । शोषयति । कामस्य । इषु: । सुऽसंनता । प्राचीनऽपक्षा । विऽओषा । तया । विध्यामि । त्वा । हृदि ॥२५.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:25» पर्यायः:0» मन्त्र:3


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

अविद्या के नाश से विद्या की प्राप्ति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (कामस्य) सुन्दर मनोरथ का (सुसंनता) ठीक-२ लक्ष्य पर चलाया हुआ, (प्राचीनपक्षा) प्राचीन [वेदविज्ञान] का पंख रखनेवाला, (व्योषा) विविध प्रकार से [अविद्या का] दाह करनेवाला [बुद्धिरूपी] (या) जो (इषुः) तीर [अविद्या] की (प्लीहानम्) गति [वा तिल्ली नाम मर्मस्थान] को (शोषयति) सुखा देता है, (तया) उससे (त्वा) तुझ [अविद्या] को (हृदि) हृदय में (विध्यामि) बेधता हूँ ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य पूर्ण ब्रह्मचर्य और दृढ़ प्रतिज्ञा से वेदविज्ञान द्वारा अविद्या मिटाकर आनन्द भोगे, जैसे शूर वैरी का मर्मस्थान छेद कर सुखी होता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(प्लीहानम्) अ० २।३३।३। प्लिह गतौ-कनिन्। गमनम्। कुक्षिवामपार्श्वस्थमांसखण्डम् (शोषयति) दहति (कामस्य) सुमनोरथस्य (इषुः) तीरम् (सुसंनता) सुष्ठु सम्यक् लक्ष्यीकृता (प्राचीनपक्षा) प्राचीनं वेदविज्ञानं पक्ष इव यस्याः सा तथोक्ता (व्योषा) वि+उष दाहे पचाद्यच्, टाप्। विशेषेण दाहशीला। अन्यद्गतम्-म० १ ॥