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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अविद्या के नाश से विद्या की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे अविद्या !] (उत्तुदः) तेरा उखाड़नेवाला [विद्वान्] (त्वा) तुझको (उत् तुदतु) उखाड़ दे। (स्वे शयने) अपने शयन स्थान [हृदय] में (मा धृथाः) मत ठहर। (कामस्य) सुकामना का (या) जो [तेरे लिये] (भीमा) भयानक (इषुः) तीर है, (तया) उससे (त्वा) तुझको (हृदि) हृदय में (विध्यामि) बेधता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - सब स्त्री पुरुष ब्रह्मचर्यादि तपोबल द्वारा अविद्या को हृदय से मिटावें, जैसे शूर वीर योद्धा शत्रु सेना को अस्त्र शस्त्रों से मार गिराता है ॥१॥ इस सूक्त में स्त्री लिङ्ग शब्द अविद्या और विद्या के लिए आये हैं। पहले तीन मन्त्र अविद्यापरक, और पिछले तीन विद्यापरक हैं। अलङ्कार से अविद्या को दुःखदायिनी और विद्या को सुखदायिनी मानकर संबोधन किया है ॥
