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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
धान्य बढ़ाने के कर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्रजापते) हे प्रजापालक गृहस्थ ! (उपोहः) योग [प्राप्ति] (च) और (समूहः) संग्रह [क्षेम वा रक्षा] दोनों (च) निश्चय करके (ते) तेरे (क्षत्तारौ) क्षत्रिय [क्षति वा हानि से बचानेवाले] हैं। (तौ) वे दोनों (इह) यहाँ पर (स्फातिम्) बढ़ती और (बहुम्) बहुत (अक्षितम्) अचूक (भूमानम्) अधिकाई (आ वहताम्) लावें ॥७॥
भावार्थभाषाः - गृहस्थ लोग पुरुषार्थ करके विद्या, धन, धान्य आदि जीवन सामग्री की १-प्राप्ति, २-रक्षा और ३-वृद्धि वा ऋद्धि सिद्धि करके आनन्द भोगें ॥७॥ यजुर्वेद में आया हैः−योगक्षे॒मो नः॑ कल्पताम् ॥ य० २२।२२ ॥ (नः) हमारा (योगक्षेमः) योग-अप्राप्त वस्तु का लाभ, और क्षेम-प्राप्त पदार्थ की रक्षा (कल्पताम्) समर्थ अर्थात् पर्याप्त होवे ॥
टिप्पणी: ७−(उपोहः) उप+ऊह वितर्के-घञ्। योगः। अलब्धलाभः। (समूहः) सम्+ऊह-घञ्। समुदायः। क्षेमः। लब्धस्य रक्षणम् (क्षत्तारौ) क्षणु वधे-क्विप्, इति क्षात्। तॄ तरणे, णिच्-अच्। तारयतीति तारः। क्षतः क्षतात् रक्षकौ। क्षत्रियौ। (ते) तव। (प्रजापते) हे सन्तानपालक गृहस्थ। (तौ) तादृशौ। उपोहसमूहौ। (आ वहताम्) आनयताम् (स्फातिम्) म० ४। समृद्धिम् (बहुम्) विपुलम् (भूमानम्) बहु-इमनिच्। बहोर्लोपो भू च बहोः। पा० ६।४।१५८। इति इमनिच् इकारलोपो बहोर्भूभावश्च। धनधान्यविषयं बहुभावम्। (अक्षितम्) क्षयरहितम् ॥
