धान्य बढ़ाने के कर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इमाः) यह (याः) जो (मानवीः=०-व्यः) मानुषी (पञ्च) पाँच भूत [पृथिवी आदि] से सम्बन्धवाली (कृष्टयः) प्रजायें (पञ्च प्रदिशः) पाँच फैली हुई दिशाओं में हैं, वे प्रजायें (शापम्) अनिष्ट वा मलिनता हटाकर (इह) यहाँ पर (स्फातिम्) बढ़ती को (समावहान्) यथावत् लावें, और (नदीः इव नद्यः इव) जैसे नदियाँ (वृष्टे) बरसने पर [अनिष्ट वा मलिनता हटाकर] (शतधारम्) सैकड़ों धाराओंवाले और (सहस्रधारम्) सहस्रों विधि से धारण करनेवाले, (अक्षितम्) अक्षय (उत्सम्) सींचने के साधन [झरना, कूप आदि] को (उत्=उदावहन्ति) निकालती हैं (एव=एवम्) ऐसे ही (अस्माक=अस्माकम्) हमारा (इदम्) यह (धान्यम्) धान्य (सहस्रधारम्) सहस्रों प्रकार से धारण करनेवाला और (अक्षितम्) अक्षय [होवे] ॥३, ४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य खेती व्यापार आदि द्वारा पूर्वादि चार दिशाओं और ऊपर नीचे की दिशा [वायु मण्डल वा पाताल] से बहुत धन प्राप्त करें और अनेक प्रयोगों से उसकी यथावत् वृद्धि करें, जैसे बरसा का जल नदियों में एकत्र होकर और झरनों, कूपों, नालियों से खेती आदि में पहुँचकर दरिद्रता आदि मिटाकर संसार को लाभ पहुँचाता है ॥३, ४॥ मन्त्र ३ व ४ युग्मक छन्द हैं ॥