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पय॑स्वती॒रोष॑धयः॒ पय॑स्वन्माम॒कं वचः॑। अथो॒ पय॑स्वतीना॒मा भ॑रे॒ऽहं स॑हस्र॒शः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पयस्वती: । ओषधय: । पयस्वत् । मामकम् । वच: । अथो इति । पयस्वतीनाम् । आ । भरे । अहम् । सहस्रऽश: ॥२४.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:24» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

धान्य बढ़ाने के कर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ओषधयः) ओषधियाँ, चावल जौ आदि वस्तुएँ (पयस्वतीः=०-त्यः) सारवाली होवें, और (मामकम्) मेरा (वचः) वचन (पयस्वत्) सारवाला होवे। (अथो) और भी (अहम्) मैं (पयस्वतीनाम्) सारवाली [ओषधियों] का (सहस्रशः) सहस्रों प्रकार से (आ) यथाविधि (भरे) धारण करूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य विद्यापूर्वक अन्न आदि पदार्थों को उत्तम बनावें और दृढ़ सत्य वचन बोलें। ऐसा करने से शारीरिक और आत्मिक उन्नति होती है ॥१॥ मनु महाराज का वचन है−उद्भिजाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्डप्ररोहिणः। ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः ॥ मनु० १।४६ ॥ भूमि को फाड़कर उपजनेवाले, और बीज वा शाखा से उगनेवाले सब वृक्ष हैं, फल पाक के साथ नष्ट होनेवाली और बहुत फूल फलवाली ओषधियाँ [चावल, जौ आदि] हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(पयस्वतीः) पयस्वत्यः। सारवत्यः (ओषधयः) अ० १।२३।१। व्रीहियवाद्याः (पयस्वत्) सारयुक्तम्। (मामकम्) मदीयम्। [वचः] वचनम्। (अथो) अपि च। (पयस्वतीनाम्) कर्मणि षष्ठी। सारवतीनामोषधीनाम्। (आ) समन्तात् (भरे) भरामि। [सहस्रशः] वह्लल्पार्थाच्छस्कारकादन्यतरस्याम्। पा० ५।४।४२। इति सहस्र-शस्। बहुप्रकारेण ॥