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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वीर सन्तान उत्पन्न करने के उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे सुभगे] (पुमान्) रक्षा करनेवाला, पराक्रमी (गर्भः) गर्भ (ते) तेरे (योनिम्) गर्भाशय में (आ एतु) आवे, (बाणः इव) जैसे बाण (इषुधिम्) तूणीर [तीरों के थैले] में। (अत्र) इस घर में (दशमास्यः) दश महीने तक पुष्ट हुआ, (ते) तेरा (वीरः) वीर, (पुत्र) कुलशोधक बालक (आ जायताम्) अच्छे प्रकार उत्पन्न हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - वधू और वर यथाविधि ब्रह्मचारी रहकर युक्त आहार विहार करके सन्तान उत्पन्न करें, जिससे गर्भ अवश्य स्थिर रहे और पूर्ण रीति से पुष्ट होकर वीर सन्तान उत्पन्न हो ॥२॥ यहाँ पर अथर्ववेद का० १ सू० ११ मन्त्र ६ का मिलान करो। ऋग्वेद में ऐसा वर्णन है−द॒श मासा॑ञ्छशया॒नः कु॑मा॒रो अधि मा॒तरि॑। नि॒रैतु॑ जी॒वो अक्ष॑तो जी॒वो जीव॑न्त्या॒ अधि॑ ॥ ऋ० ५।७८।९ ॥ (मातरि अधि) माता के गर्भ में जो (कुमारः) बालक (दश मासान्) दश महीनों तक (शशयानः) सोता रहा है, वह (जीवः) जीता हुआ (अक्षतः) घाव से रहित (जीवः) जीव (जीवन्त्याः अधि) जीवती हुई माता से (निरैतु) बाहिर आवे। श्री सायणाचार्य ने यह मन्त्र इस प्रकार श्लोक में लिखा है−दश मासानुषित्वासौ जननीजठरे सुखम्। निर्गच्छतु सुखं जीवो जननी चापि जीवतु ॥ ऋ० सा० भा० ५।७८।९। (जननीजठरे) माता के पेट में (सुखम्) सुख से (दश मासान्) दस महीनों तक (उषित्वा) सोकर (असौ जीवः) वह जीव (निर्गच्छतु) बाहिर आवे, (च) और (जननी अपि) माता भी (जीवतु) जीवित रहे ॥२॥
टिप्पणी: २−(योनिम्) अ० १।११।३। गर्भाशयम्। (गर्भः) अ० १।११।२। भ्रूणः। उदरस्थबालकः। (आ, एतु) आगच्छतु। (पुमान्) अ० १।८।१। पा रक्षणे-डुमसुन्। रक्षणसमर्थः सन्तानः। (बाणः) बण शब्दे गतौ वा-घञ्। शरः। नाराचः। (इषुधिम्) कर्मण्यधिकरणे च। पा० ३।३।९३। इति इषु+धा-कि। निषङ्गम्। (वीरः) शूरः। (अत्र) अस्मिन् कुले। (जायताम्) उत्पद्यताम्। (पुत्रः) अ० १।११।५। कुलशोधकः पुरुत्राता। पुतो नरकात् त्राता सन्तानः। यथा, तनयः, सूनुः, इति अपत्यनामसु पठितम्-निघ० २।२। (दशमास्यः) अ० १।११।६। दशमासान् भूतः ॥
