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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वीर सन्तान उत्पन्न करने के उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे स्त्री] (येन) जिस कारण से तू (वेहत्) बन्घ्या [बाँझ] (बभूविथ) हुई है, (तत्) उस कारण को (त्वत्) तुझसे (नाशयामसि) हम नष्ट करते हैं। (इदम्=इदानीम्) अभी (तत्) उसको (त्वत्) तुझसे (अन्यत्र) और कहीं (दूरे) दूर (अप=अपहृत्य) हटाकर (निदध्मसि=०-ध्मः) हम रखते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - सद्वैद्य पुत्रेष्टि यज्ञ करके ओषधि द्वारा बाँझपन मिटाकर वीर सन्तान उत्पन्न करते हैं, देखो−श्रीमद् दयानन्दकृत संस्कारविधि-गर्भाधानप्रकरण ॥१॥
टिप्पणी: १−(येन) येन पापजन्यरोगादिना (वेहत्) संश्चत्तृपद्वेहत्। उ० २।८५। इति वि+हन वधे-अति। इकारस्य एकारो नलोपश्च निपात्येते। विशेषेण हन्ति गर्भं या, गर्भघातिनी। बन्ध्या। (नाशयामसि) नाशयामः। चिकित्सया अपहन्मः। (त्वत्) त्वत्तः सकाशात्। (इदम्) इदानीम्। (दूरे) दूरदेशे। (अप नि दध्मसि) अपहृत्य निक्षिपामः ॥
