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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कीर्ति पाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (हि) क्योंकि (सुषदाम्) सुखसे चढ़ने योग्य (मृगाणाम्) पशुओं में (हस्ती) हाथी (अतिष्ठावान्) प्रतिष्ठावाला (बभूव) हुआ है, (तस्य) उसके (भगेन) सेवनीय (वर्चसा) कान्ति से (अहम्) मैं (माम्) अपने को (अभिषिञ्चामि) भले प्रकार सींचूँ [शुद्ध करूँ] ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे हाथी में अन्य पशुओं से अधिक बुद्धि बल होता है, वैसे ही प्रधान पुरुष अन्य पुरुषों से अधिक बुद्धिबलवाला होवे ॥६॥
टिप्पणी: ६−(हस्ती) गजः। (मृगाणम्) पशूनां मध्ये। (सुषदाम्) अ० ३।१४।१। सुखेन सदनयोग्यानाम्। (अतिष्ठावान्) आतश्चोपसर्गे। पा० ३।१।१०६। इति अति+ष्ठा-अङ्, टाप्, मतुप्। प्रतिष्ठावान्। (हि) यस्मात् कारणात्। (तस्य) गजस्य। (भगेन) भजनीयेन। सेवनीयेन। (वर्चसा) तेजसा। (अभि) सर्वतः। (सिञ्चामि) शोधयामि। (माम्) आत्मानम्। (अहम्) उपासकः ॥
