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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (क्रव्यात्) मांस खानेवाला (अग्निः) अग्नि [समान तापकारी दुःख] (शान्तः) शान्त हो। (पुरुषरेषणः) पुरुषों का सतानेवाला [कष्ट] (शान्तः) शान्त हो। (अथो) और भी (यः) जो (विश्वदाव्यः) सब [सुखों] का जलानेवाला है (तम्) उस (क्रव्यादम्) मांस खानेवाले [अग्निरूप दुःख] को (अशीशमम्) मैंने शान्त कर दिया है ॥९॥
भावार्थभाषाः - दूरदर्शी पुरुष विघ्नों को हटाकर आप सुखी रहते और सबको सुखी रखते हैं ॥९॥
टिप्पणी: ९−(शान्तः) सुखकरः। (अग्निः) अग्निवत्तापकरं दुःखम्। (क्रव्यात्) म० ८। मांसभक्षकः। (पुरुषरेषणः) रिष वधे-ल्युट्। पुरुषहिंसकः। (विश्वदाव्यः) म० ३। सर्वसुखनाशनसमर्थः। (अशीशमम्) शमु उपशमे-ण्यन्तात् लुङि चङि रूपम्। अहं शान्तं कृतवान्। अन्यद् गतम् ॥
