देवता: सोमः, अग्निः, आदित्यः, विष्णुः, ब्रह्मा, बृहस्पतिः
ऋषि: वसिष्ठः
छन्द: अनुष्टुप्
स्वर: रयिसंवर्धन सूक्त
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अवसे) रक्षा के लिए (गीर्भिः) स्तुतियों से (सोमम्) ऐश्वर्य के कारण, (राजानम्) सबके शासक (अग्निम्) विद्वान् (आदित्यम्) बड़े दीप्यमान, (विष्णुम्) सबमें व्यापक, (सूर्यम्) चलानेवाले, (ब्रह्माणम्) सबमें बड़े वेदप्रकाशक ब्रह्मा (च) और (बृहस्पतिम्) बड़े बड़ों के रक्षक बृहस्पति [परमेश्वर वा मनुष्य] को (हवामहे) हम बुलाते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य जगदीश्वर के गुण, कर्म स्वभाव के ज्ञान और बड़े लोगों के आश्रय से अपना सामर्थ्य बढ़ावें ॥४॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद ९।२६ में है ॥
टिप्पणी: ४−(सोमम्) अ० १।६।२। ऐश्वर्यहेतुम्। (राजानम्) अ० १।१०।१। सर्वशासकम्। (अवसे) रक्षणाय। (अग्निम्) विद्वांसम्। (गीर्भिः) वाणीभिः। स्तुतिभिः। (हवामहे) आह्वयामः। (आदित्यम्) अ० १।९।१। आदीप्यमानम्। (विष्णुम्) विषेः किच्च। उ० ३।३९। इति विष्लृ, व्याप्तौ-नु। विष्णुः, यज्ञः। निघ० ३।१७। पदनाम, निघ० ४।२। यद्विषितो भवति तद्विष्णुर्भवति विष्णुर्विशतेर्वा-निरु० १२।१८। व्यापकम्। (सूर्यम्) अ० १।३।५। सर्वप्रेरकम्। (ब्रह्माणम्) अ० २।६।२। सर्ववृद्धम्। वेदप्रकाशकम्। (बृहस्पतिम्)। अ० १।८।२। बृहतां महतां पालकम् ॥
