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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष ! (अच्छ) अच्छे प्रकार से (इह) यहाँ पर (नः) हमसे (वद) बोल, और (प्रत्यङ्) प्रत्यक्ष होकर (नः) हमारे लिए (सुमनाः) प्रसन्न मन (भव) हो। (विशाम् पते) हे प्रजाओं के रक्षक ! (नः) हमें (प्र यच्छ) दान दे, (त्वम्) तू (नः) हमारा (धनदाः) धनदाता (असि) है ॥२॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य विद्वानों से विद्या ग्रहण करके संसार में ऐश्वर्य प्राप्त करें ॥२॥ मन्त्र २-७ ऋग्वेद म० १० सू० १४१ म० १-५ में कुछ भेद से हैं। यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद अ० ९ मन्त्र २८ में है ॥
टिप्पणी: २−(अग्ने) हे विद्वन् ! (अच्छ) सम्यक्। (वद) ब्रूहि। उपदिश। (इह) अत्र समाजे। (प्रत्यङ्) प्रत्यञ्चन् अभिमुखं गच्छन्। (नः) अस्मान्। अस्मभ्यम्। (सुमनाः) प्रीतिमनाः। (प्र यच्छ) दानं कुरु। (विशांपते) हे प्रजानां पालक। (धनदाः) धन+दा-विच्। ऐश्वर्यस्य दाता। अन्यत् सुगमम् ॥
