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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष ! (अयम्) यह [सर्वव्यापी परमेश्वर] (ते) तेरा (ऋत्वियः) सब ऋतुओं [कालों] में मिलनेवाला (योनिः) कारण है, (यतः) जिससे (जातः) प्रकट होकर (अरोचनाः) तू प्रकाशमान हुआ है, (तम्) उस [योनि] को (जानन्) पहिचानकर (आ रोह) ऊँचा चढ़, (अथ) और (नः) हमारे लिये (रयिम्) धन (वर्धय) बढ़ा ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ने अपनी सर्वशक्तिमत्ता और सर्वव्यापकता से हमें बड़ा समर्थ और उपकारी मनुष्य देह दिया है, ऐसा जानकर हम अपना ऐश्वर्य बढ़ावें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद ३।२९।१०। और यजुर्वेद ३।१४ और १२।५२ एवं १५।५६। में है ॥
टिप्पणी: १−(अयम्) सर्वत्र दृश्यमानः। (ते) तव। (योनिः) अ० १।११।३। कारणम्। (ऋत्वियः) अर्त्तेश्च तुः। उ०। ऋ गतौ-तु, चकारात् कित्। छन्दसि घस्। पा० ५।१।१०६। इति ऋतुशब्दात् तस्य प्राप्तमित्यर्थे घस्। इयादेशः। सर्वेषु ऋतुषु कालेषु प्राप्तः। (यतः) यस्माद् योनेः। (जातः) उत्पन्नः। प्रकटः सन्। (अरोचथाः) रुच दीप्तावभिप्रीतौ च लङ्। त्वम् अदीप्यथाः। दीप्तोऽभवः। (तम्) योनिम्। (जानन्) अवगच्छन्। (अग्ने) अगि गतौ-नि। हे विद्वन्। (आ रोह) उन्नतिं प्राप्नुहि। (अथ) अनन्तरम्। (नः) अस्मभ्यम्। (वर्धय) समर्धय। (रयिम्) धनम्। ऐश्वर्यम् ॥
