0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - हे (एषाम्) इन [शत्रुओं] के (आकूतयः) विचारो ! (वि) उलट-पलट होकर (इत) चले जाओ, (अथो) और हे (चित्तानि) इनके चित्तो ! (मुह्यत) व्याकुल हो जाओ। (अथो) और [हे राजन्] (यत्) जो कुछ [मनोरथ] (अद्य) अब (एषाम्) इनके (हृदि) हृदय में है, (एषाम्) इनके (तत्) उस [मनोरथ] को (परि) सर्वथा (निर्जहि) नाश कर दे ॥४॥
भावार्थभाषाः - नीतिकुशल राजा दुराचारियों में परस्पर मतभेद करा दे और उनका मनोरथ सिद्ध न होने दे ॥४॥
टिप्पणी: ४−(आकूतयः)। म० ३। हे सङ्कल्पाः। मनोरथाः। (एषाम्)। शत्रूणाम्। (वि, इत्)। विरोधेन गच्छत। (अथो)। अपि च। (चित्तानि)। मनांसि। (मुह्यत)। व्याकुलानि भवत। (यत्)। प्रयोजनम्। (अद्य)। इदानीम्। (हृदि)। मनसि। (तत्)। प्रयोजनम्। (परि)। परितः। सर्वतः। (निः)। नितराम्। (जहि)। नाशय ॥
