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अ॒भि ते॑ऽधां॒ सह॑माना॒मुप॑ तेऽधां॒ सही॑यसीम्। मामनु॒ प्र ते॒ मनो॑ व॒त्सं गौरि॑व धावतु प॒था वारि॑व धावतु ॥

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पद पाठ

अभि । ते । अधाम् । सहमानाम् । उप । ते । अधाम् । सहीयसीम् । माम् । अनु । प्र । ते । मन: । वत्सम् । गौ:ऽइव । धावतु । पथा । वा:ऽइव । धावतु ॥१८.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:18» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या की सपत्नी अविद्या के नाश का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे जीव !] (ते) तेरे लिए (सहमानाम्) प्रबल [अविद्या] को (अभि=अभिभूय) हराकर (अधाम्) मैंने रक्खा है, और (ते) तेरे लिये (सहीयसीम्) अधिक प्रबल [ब्रह्मविद्या] को (उप) आदर से (अधाम्) मैंने रक्खा है, सो (ते मनः) तेरा मन (माम् अनु) मेरे पीछे-पीछे [योगी के स्वरूप में] (प्रधावतु) दौड़ता रहे और (धावतु) दौड़ता रहे, (गौः इव) जैसे गौ (वत्सम्) अपने बछड़े के पीछे, और (वाः इव) जैसे जल (पथा) अपने मार्ग से [दौड़ता है] ॥६॥
भावार्थभाषाः - योगवृत्तियों के निरोध से अविद्या को जीतकर स्वरूप अर्थात् अपनी और परमात्मा की शक्ति को जानकर परोपकार में आगे बढ़ता है, जैसे स्वभाव से गौ अपने छोटे बच्चे के पीछे दौड़ती फिरती है और पानी नीचे मार्ग से समुद्र को चला जाता है ॥६॥ भगवान् पतञ्जलि ने कहा है−योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ यो० द० १।२, ३ ॥ योग चित्त की वृत्तियों का रोकना है ॥१॥ तब देखनेवाले को अपने रूप में चित्त का ठहराव होता है ॥२॥
टिप्पणी: ६−(अभि) अभिभूय। जित्वा। (ते) तव हिताय। (अधाम्) डुधाञ् धारणपोषणयोः-लुङ्। अहम् अधार्षम्। (सहमानाम्) म० ५। प्रबलाम् अविद्याम्। (उप) पूजायाम्। (सहीयसीम्)। सोढृ-ईयसुन्। सोढृतराम्। बलवत्तरां ब्रह्मविद्याम्। (माम्) योगिनम्। (अनु) अनुसृत्य। (ते) तव। (मनः) चित्तम्। (वत्सम्)। गोशिशुम्। (गौः इव) धेनुर्यथा। (प्रधावतु) प्रकर्षेण शीघ्रं गच्छतु। (पथा) मार्गेण। (वार्) अ० ३।१३।३। जलम् ॥