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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या की सपत्नी अविद्या के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (उत्तानपर्णे) हे विस्तृत पालनवाली ! (सुभगे) हे बड़े ऐश्वर्यवाली ! (देवजूते) हे विद्वानों करके प्राप्त की हुई ! (सहस्वति) हे बलवती [ब्रह्मविद्या] ! (मे) मेरी (सपत्नीम्) विरोधिनी [अविद्या] को (परा नुद) दूर हटा दे और (पतिम्) सर्वरक्षक वा सर्वशक्तिमान् परमेश्वर को (मे) मेरा (केवलम्) सेवनीय (कृधि) कर ॥२॥
भावार्थभाषाः - अनन्यवृत्ति पुरुष ब्रह्मविद्या से अविद्या को हटाकर आनन्दस्वरूप जगदीश्वर को जानकर आनन्द भोगता है ॥२॥
टिप्पणी: २−(उत्तानपर्णे) उत्+तनु विस्तारे-घञ्। धापॄवस्यज्यतिभ्यो नः। उ० ३।६। इति पॄ पालनपूरणयोः-न। हे उत्तमतया विस्तृतपालनयुक्ते। (सुभगे) हे सौभाग्यहेतुभूते। (देवजूते) जु गतौ-क्त। विद्वद्भिः प्राप्ते। (सहस्वति) हे बलवति ब्रह्मविद्ये। (सपत्नीम्) म० १। विरोधिनीम्। अविद्याम्। (मे) मम। (परा नुद) पराङ्मुखीं गमय। (पतिम्) म० १। (केवलम्) वृषादिभ्यश्चित्। उ० १।१०६। इति केवृ सेवने-कलच्। निर्णीतम्। सेवनीयम्। (कृधि) कुरु ॥
