0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
खेती की विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सीते) हे जुती धरती ! [लक्ष्मी, खेती] (त्वा) तेरी (वन्दामहे) हम वन्दना करते हैं, (सुभगे) हे सौभाग्यवती [बड़े ऐश्वर्यवाली] (अर्वाची) हमारे सन्मुख (भव) रह, (यथा) जिससे तू (नः) हमारे लिए (सुमनाः) प्रसन्न मनवाली (असः) होवे, और (यथा) जिससे (नः) हमारे लिए (सुफला) सुन्दर फलवाली (भुवः) होवे ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य खेती को मन लगा करके चौकसी रक्खे, जिससे अन्नवान् और धनवान् होकर सदा आनन्द भोगे ॥८॥
टिप्पणी: ८−(सीते) म० ४। लाङ्गलपद्धतिरूपा कृषिक्रिया लक्ष्मीः। तत्सम्बुद्धौ। (वन्दामहे) वदि अभिवादनस्तुत्योः। अभिवादयामः। स्तुमः। (त्वा) त्वाम्। (अर्वाची) अवर+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्, ङीप्। अर्वादेशः। निकटस्था। अभिमुखी। (सुभगे) हे सौभाग्ययुक्ते। ऐश्वर्यवति। (नः) अस्मभ्यम्। (सुमनाः) प्रसन्नमनस्का। (असः) लेट्। त्वं स्याः। (सुफला) शोभनफलोपेता। (भुवः) लेट्। त्वं भवेः ॥
