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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
खेती की विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शुनासीरा=०-रौ) हे वायु और सूर्य तुम दोनों ! (इह स्म) यहाँ पर ही (मे) मेरी [विनय] (जुषेथाम्) स्वीकार करो, (यत् पयः) जो जल (दिवि) आकाश मे (चक्रथुः) तुम दोनों ने बनाया है, (तेन) उससे (इमाम्) इस [भूमि] को (उप सिञ्चतम्) सींचते रहो ॥७॥
भावार्थभाषाः - पवन और सूर्य के द्वारा पृथिवी का जल आकाश में जाकर फिर पृथिवी पर बरसता है, वह खेती के लिए बहुत उपयोगी होता है ॥७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से निरु० ९।४१ में भी है ॥
टिप्पणी: ७−(शुनासीरा) म० ५। हे पवनादित्यौ। (इह स्म) अत्रैव। (जुषेथाम्) युवां सेवेथाम्। स्वीकुरुतम्। (दिवि) आकाशे। (चक्रथुः) डुकृञ् करणे लिट्। युवां कृतवन्तौ। (पयः) उदकम्। निघ० १।१२। (इमाम्) दृश्यमानां भूमिम्। (उप सिञ्चतम्) व्याप्य आर्द्रीकुरुतम् ॥
