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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
खेती की विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वाहाः) बैल आदि पशु (शुनम्) सुख से रहें। (नरः) हाँकनेवाले किसान (शुनम्) सुख से रहें। (लाङ्गलम्) हल (शुनम्) सुख से (कृषतु) जोते। (वरत्राः) हल की रस्सियाँ (शुनम्) सुख से (बध्यन्ताम्) बाँधी जावें। (अष्ट्राम्) पैना [आर वा काँटे] को (शुनम्) सुख से (उत् इङ्गय) ऊपर चला ॥६॥
भावार्थभाषाः - किसान लोग सब सामग्री उत्तम रीति से बनाकर रखने से अपने सब काम सुख से चलावें ॥६॥ यह मन्त्र ६-८ कुछ भेद से ऋ० ४।५७।४-६ में है ॥
टिप्पणी: ६−(शुनम्) सुखेन। (वाहाः) वृषभादयः। (नरः) अ० ३।१६।३। नयतीति ना। नेतारः कर्षकाः। (कृषतु) विलिखतु। (लाङ्गलम्) हलम्। (वरत्राः) वृञश्चित्। उ० ३।१०७। इति वृञ् संवरणे-अत्रन्। टाप्। बन्धन-रज्जवः। (बध्यन्ताम्) बद्धा भवन्तु। (अष्ट्राम्) अमिचिमिशसिभ्यः क्त्रः। उ० ४।१६४। इति अशूङ् व्याप्तौ-क्त, टाप्। प्रतोदम्। ताडनीम्। (उत् इङ्गय) उपरि गमय। प्रेरय ॥
