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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
खेती की विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) भूमि जोतनेवाला (सीताम्) हल की रेखा [जुती धरती] को (नि) नीचे (गृह्णातु) दबावे, (पूषा) पोषण करनेवाला [किसान] (ताम्) उस [जुती धरती] की (अभिरक्षतु) सब ओर से रखवाली करे। (सा) वह (पयस्वती) पानी से भरी [जुती धरती] (नः) हमको (उत्तराम्-उत्तराम्) उत्तम-उत्तम (समाम्) अनुकूल क्रिया से (दुहाम्) भरती रहे ॥४॥
भावार्थभाषाः - किसान बीज बोने के पीछे जुती धरती को पटेले से चौरस करके रक्षा करे और यथासमय पानी देता रहे जिससे खेतों में ठीक-ठीक उपज होवे ॥४॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० ४।५७।७ में है और इसका उत्तरार्ध अ० ३।१०।१। में आ चुका है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(इन्द्रः) ऋज्रेन्द्राग्रवज्र०। उ० २।२८। इति इरा+दॄ विदारणे रक्। इन्द्र इरां दृणातीति वा०-निरु० १०।८। इराया भूमेर्विदारकः कर्षकः। (सीताम्) दुतनिभ्यां दीर्घश्च। उ० ३।९०। इति षिज् बन्धे-क्त। क्षेत्रे हलेन कृता रेखा। कर्षितभूमिरित्यर्थः। (नि) नीचैः। (गृह्णातु) सम्पादयतु। (पूषा) पोषकः कृषीवलः। (अभि) सर्वतः। (रक्षतु) पालयतु। (पयस्वती) उदकवती सती। (नः) अस्मान्। (दुहाम्) द्विकर्मकः। दुग्धाम्। प्रपूरयतु। (उत्तराम्-उत्तराम्) अतिशयेनोत्कृष्टाम्। (समाम्) अ० ३।१०।१। समक्रियाम्। अनुकूलक्रियाम् ॥
