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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
खेती की विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (धीराः) धीर (कवयः) बुद्धिमान् [किसान] लोग (देवेषु) व्यवहारी पुरुषों पर [सुम्नयौ] सुख पाने [की आशा] में (सीरा=सीराणि) हलों को (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं, और (युगा=युगानि) जुओं को (पृथक्) अलग-अलग करके [दोनों ओर] (वि तन्वते) फैलाते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे किसान लोग खेती करके अन्य पुरुषों को सुख पहुँचाते और आप सुखी रहते हैं, इसी प्रकार सब मनुष्यों को परस्पर उपकारी होकर सुख भोगना चाहिये ॥१॥
टिप्पणी: १−(सीरा) शुसिचिमीनां दीर्घश्च। उ० २।२५। इति षिञ् बन्धने-क्रन्। दीर्घश्च। सीराणि लाङ्गलानि। (युञ्जन्ति) योजयन्ति कर्षणार्थम्। (कवयः) मेधाविनः-निघ० ३।१५। कुशलाः कृषीवलाः। (युगा) उञ्छादीनां च। पा० ६।१।१६०। इति युज संयमे, युतौ-घञ्। अगुणत्वं निपातनात्। युगानि। रथहलादेरङ्गभेदान्। (वि तन्वते) प्रसारयन्ति। (पृथक्) प्रथेः कित् सम्प्रसारणं च। उ० १।१३७। इति प्रथ ख्यातौ-अजि। भिन्नभिन्ने स्कन्धदेशे। (धीराः) अ० २।३५।३। ध्यानवन्तः। (देवेषु) विद्वत्सु। व्यवहारिषु पुरुषेषु। (सुम्नयौ) रास्नासास्ना०। उ० ३।१५। इति सु+म्ना अभ्यासे, वा मा माने-न प्रत्ययः। निपातनात् सिद्धिः। सुम्नं सुखम्-निघ० ३।६। मृगय्वादयश्च। उ० १।३७। इति सुम्न+या गतौ प्रापणे च भावे कु। सुखस्य गतौ प्राप्तौ प्रापणे वा ॥
