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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गोरक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वः) तुम्हारी (गोष्ठः) गोशाला (शिवः) मङ्गलदायक (भवतु) होवे। (शारिशाका इव) शालि [साठी चावल] की शाखा [उपज] के समान (पुष्यत) पोषण करो। (उत) और (इह एव) यहाँ ही (प्रजायध्वम्) बच्चों से बढ़ो। (मया=अस्माभिः) अपने साथ (वः) तुमको (संसृजामसि=०−मः) हम मिलाकर रखते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे शारि, शालि साठी चावल की शालि शाका थोड़े प्रयत्न से साठ दिन में ही पक जाती है, वैसे ही मनुष्य यत्नपूर्वक थोड़े परिश्रम से पालन करके गौओं से दूध, घी और खेती के लिये बैल आदि पाकर बहुत लाभ उठाते हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५−(शिवः) सुखकरः। (वः)। युष्माकम्। (गोष्ठः)। गोशालः। (शारिशाका)। जनिघसिभ्यामिण्। उ० ४।१३०। इति शल गतौ-इञ्। लस्य रत्वम्। शल्यते प्राप्यतेऽसौ शालिः। षष्टिकादिधान्यम्। शक सामर्थ्ये घञ्, टाप्। शक्नोति कर्षको यया सा शाका, साखा, इति भाषा। अन्नोत्पत्तिः। (पुष्यत)। पोषयत। (मया)। एकवचनं बहुवचने। (अस्माभिः)। अन्यद् व्याख्यातं म० ४, १ ॥
