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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गोरक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (गावः) हे गौओ ! (इह एव) यहाँ ही (एतन) आओ (इहो=इह उ) यहाँ ही (शका इव) समर्था [गृहपत्नी] के समान (पुष्यत) पोषण करो। (उत) और (इह एव) यहाँ पर ही (प्रजायध्वम्) बच्चों से बढ़ो। (मयि) मुझमें (वः) तुम्हारा (संज्ञानम्) प्रेम (अस्तु) होवे ॥४॥
भावार्थभाषाः - जैसे समर्थ गृहपत्नी घरवालों का पोषण करके प्रसन्न रखती है, ऐसे ही गौएँ अपने दूध घी, आदि से अपने रक्षकों को पुष्ट और स्वस्थ करती हैं। इससे सब मनुष्य प्रीतिपूर्वक उनका पालन करें और उनका वंश बढ़ावें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(आ इतन)। एत। आगच्छत। (इहो)। इह-उ। अत्रैव। शका। शक्लृ सामर्थ्ये-पचाद्यच्, टाप्। शक्नोतीति शका-इति सिद्धान्तकौमुद्याम् [प्रत्ययस्थात् कात्०। पा० ७।३।४४] इति व्याख्यायाम्। समर्था राजपत्नी गृहपत्नी वा। (पुष्यत)। पोषयत। (उत)। अपि च। (प्र जायध्वम्)। प्रजया प्रवर्धध्वम्। (मयि)। गोरक्षके। (संज्ञानम्)। सम्यग् ज्ञानम्। प्रीतिभावः। (वः)। युष्माकम् ॥
