0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गोरक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वः) तुमको (अर्यमा) अरि अर्थात् हिंसकों का नियामक [गोपाल] (सम्) मिलाकर (पूषा) पोषण करनेवाला [गृहपति] (सम्) मिलाकर और (बृहस्पतिः) बड़े-बड़ों का रक्षक [विद्वान् वैद्यादि पुरुष] (सम्) मिलाकर और (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाला राजा, (यः धनंजयः) जो धनों का जीतनेवाला है, (सम् सृजतु) मिलाकर रक्खे। (मयि) मुझमें (यत्) पूजनीय (वसु) धन को (पुष्यत) तुम पुष्ट करो ॥२॥
भावार्थभाषाः - सब प्रजागण और प्रजापालक राजा राजनियम से गौओं की वृद्धि करें जिससे कृषि, व्यापारादि द्वारा संसार में धन बढ़े ॥२॥
टिप्पणी: २−(वः)। युष्मान्। (सं सृजतु)। संयोज्य पालयतु। (अर्यमा)। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति ऋ हिंसायाम्-विच्। पुगन्तलघूपधस्य च। पा० ७।३।८६। इति गुणः। ऋणोति हिनस्तीति अर् अरिः। श्वन्नुक्षन्पूषन्प्लीहन्क्लेदन्स्नेहन्मज्जन्मूर्धन्नर्यमन्०। उ० १।१५९। इति अर्+यम नियमे-कनिन्। अर्यमादित्योऽरीन्नियच्छतीति-निरु० ११।२३। अराम् अरीणां हिंसकानां नियामकः। गोपालः। (पूषा)। अ० १।९।१। पुष पुष्टौ-कनिन्। पोषकः। गृहपतिः। (बृहस्पतिः)। अ० १।८।२। बृहतां वेदादिशास्त्राणां पालकः। वैद्यादिविद्वान् पुरुषः। (इन्द्रः)। परमैश्वर्यवान् राजा। (धनंजयः)। संज्ञायां भृतॄवृजिधा०। पा० ३।२।४६। इति धन+जि जये खच्। अरुर्द्विषदजन्तस्य मुम्। पा० ६।३।६७। इति मुम्। धनानां जेता। (पुष्यत)। पोषयत। वर्धयत। (यत्)। त्यजितनियजिभ्यो डित्। उ० १।१३२। इति यज पूजायाम्-अदि, स च डित्। यजनीयं पूजनीयम्। (वसु)। धनम् ॥
