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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गोरक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे गौओं !] (वः) तुमको (सुषदा) सुख से बैठने योग्य (गोष्ठेन) गोशाला से (सम्) मिलाकर (रय्या) धन से (सम्) मिलाकर और (सुभूत्या) बहुत सम्पत्ति से (सम्) मिलाकर और (अहर्जातस्य) प्रतिदिन उत्पन्न होनेवाले [प्राणी] का (यत् नाम) जो नाम है, (तेन) उस [नाम] से (वः) तुमको (सम्, सृजामसि=०−मः) हम मिलाकर रखते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य गौओं को स्वच्छ नीरोग गोशाला में रखकर पालें और उनको अपने धन और सम्पत्ति का कारण जानकर अन्य प्राणियों के समान उनके नाम बहुला, कामधेनु, नन्दिनी आदि रक्खे ॥१॥
टिप्पणी: १−(सम्)। सृजामसि इति व्यवहितक्रियापदेन सर्वत्र संबन्धः। (वः)। युष्मान्। (गोष्ठेन)। गोशालया। (सुषदा)। षद्लृ गतौ-क्विप्। सुखेन सीदन्ति यत्रेति सुषत्। सुखसदनयोग्येन। (रय्या)। धनेन। (सुभूत्या)। भू सत्तायां प्राप्तौ च-क्तिन्। बहुसम्पत्त्या। (अहर्जातस्य)। नञि जहातेः। उ० १।१५८। इति नञ्+ओहाक् त्यागे, कनिन्, आतो लोपः। न जहाति न त्यजति परिवर्त्तमानत्वात्, इत्यहः, दिनम्। जनी जन्मनि-क्त। अहन्यहनि जातस्य उत्पन्नस्य प्राणिनः। (संसृजामसि)। संसृजामः संयोजयामः। अन्यत् सुगमम् ॥
