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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जल के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आपः) हे प्राप्ति के योग्य जल धाराओं ! (इदम्) यह (वः) तुम्हारा (हृदयम्) स्वीकार योग्य हृदय वा कर्म है। (ऋतावरीः) हे सत्यशील [जलधाराओं !] (अयम्) यह (वत्सः) निवास देनेवाला, आश्रय है। (शक्वरीः) हे शक्तिवालियों ! (इत्थम्) इस प्रकार से (इह) यहाँ पर (आ इत) आओ, (यत्र) जहाँ (वः) तुम्हारे (इदम्) जल को (वेशयामि) प्रवेश करूँ ॥७॥
भावार्थभाषाः - कृषि, यन्त्र, औषधादि में जल के यथायोग्य प्रयोग से प्राणियों को सुख मिलता है ॥७॥
टिप्पणी: ७−(इदम्)। उपरोक्तम्। (वः)। युष्माकम्। (आपः)। हे प्राप्तव्या जलधाराः। (हृदयम्)। वृह्रोः षुग्दुकौ च। उ० ४।१०। इति हृञ् हरणे-कथन् दुक् च, हरणं प्रापणं स्वीकारः स्तेयं नाशनं च। हरणीयं प्राप्तव्यं हृदयं कर्म वा। (वत्सः)। वृतॄवदिवचिवसि०। उ० ३।६२। इति वस निवासे-स। निवासकः। आश्रयः। (ऋतावरीः)। छन्दसीवनिपौ च। वा० पा० ५।२।१०९। इति मत्वर्थीयो वनिप्। वनो र च। पा० ४।१।७। इति ङीब्रेफौ। अन्येषामपि दृश्यते। पा० ६।३।१३७। इति सांहितिको दीर्घः। वा छन्दसि। पा० ३।४।८८। इति जसः पूर्वसवर्णदीर्घः। हे ऋतवर्यः। सत्योपेताः। (इत्थम्)। अनेन प्रकारेण। (आ इत)। आगच्छत। (शक्वरीः)। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति शक्लृ शक्तौ-वनिप्। पूर्ववद् ङीब्रेफपूर्वसवर्णदीर्घाः। (शक्वर्यः)। शक्ताः। समर्थाः। (यत्र)। (इदम्)। इन्देः कमिन्नलोपः। उ० ४।१५७। इति इदि परमैश्वर्ये-कमिन्। उदकम्-निघ० १।१२। (वेशयामि)। प्रवेशयामि। अन्तः स्थापयामि ॥
