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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
जल के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जब (आत्) फिर (वरुणेन) सूर्य करके (प्रेषिताः) भेजे हुए तुम (शीभम्) शीघ्र (समवल्गत) मिलकर चलो, (तत्) तव (इन्द्रः) जीव ने [वा सूर्य ने] (यतीः) चलते हुए। (वः) तुमको (आप्नोत्) प्राप्त किया (तस्मात्) उससे (अनु) पीछे (आपः) प्राप्तियोग्य जल [नाम] (स्थन) तुम हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में आप्नोत् और आपः शब्द एक ही धातु आप्लृ व्याप्तौ से सिद्ध है। जब सूर्य की शक्ति से जल भूमि पर आकर फैलता है, तब जीव उसे पाता है, [और सूर्य भी फिर से लेता है] इससे जल का नाम आपः पाने योग्य वस्तु है। आपः शब्द नित्य स्त्रीलिङ्ग बहुवचनान्त है ॥२॥
टिप्पणी: २−(यत्)। यदा। (प्रेषिताः)। इष गतौ-क्त। प्रेरिताः। (वरुणेन)। वरणीयेन सूर्येण। (आत्)। अनन्तरम्। (शीभम्)। शीभ कत्थने-घञ्। क्षिप्रम्-निघ० २।१५। (समवल्गत)। वल्ग गतौ-लङ्, भौवादिकः। यूयं सम्भूय गतवत्यः। (तत्)। तदा। (आप्नोत्)। आप्लृ व्याप्तौ-लङ्। प्राप्तवान्। (इन्द्रः)। जीवः। सूर्यः। (वः)। युष्मान्। (यतीः)। इण् गतौ-शतृ। गमनं कुर्वतीः। (तस्मात्)। (आपः)। आप्नोतेर्ह्रस्वश्च। उ० २।५८। इति आप्लृ व्याप्तौ-क्विप्। अप्तृन्तृच्० पा० ६।४।११। इति सर्वनामस्थाने दीर्घः। आप आप्नोतेः-निरु० ९।२६। प्राप्तव्यानि जलानि। (अनु)। पश्चात्। (स्थन)। यूयं स्थ ॥
