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पू॒र्णं ना॑रि॒ प्र भ॑र कु॒म्भमे॒तं घृ॒तस्य॒ धारा॑म॒मृते॑न॒ संभृ॑ताम्। इ॒मां पा॒तॄन॒मृते॑ना सम॑ङ्ग्धीष्टापू॒र्तम॒भि र॑क्षात्येनाम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पूर्णम् । नारि । प्र । भर । कुम्भम् । एतम् । घृतस्य । धाराम् । अमृतेन । सम्ऽभृताम् । इमाम् । पातृृन् । अमृतेन । सम् । अङ्ग्धि । इष्टापूर्तम् । अभि । रक्षाति । एनाम् ॥१२.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:12» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

नवीनशाला का निर्माण और प्रवेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (नारि) हे नर का हित करनेवाली गृहपत्नी ! (एतम्) इस (पूर्णम्) पूरे (कुम्भम्) घड़े में से (अमृतेन) अमृत [हितकारी पदार्थ] से (संभृताम्) भरी हुई (घृतस्य) घी की (धाराम्) धारा को (प्र, भर=हर) अच्छे प्रकार ला। (इमाम्) इस [शाला] को और (पातॄन्) पानकर्ताओं वा रक्षकों को (अमृतेन) अमृत से (सम्) अच्छे प्रकार (अङ्ग्धि) पूर्ण कर। (इष्टापूर्तम्) यज्ञ और वेदों का अध्ययन, अन्नदानादि पुण्यकर्म (एनाम्) इस [शाला] की (अभि) सब ओर से (रक्षाति) रक्षा करे ॥८॥
भावार्थभाषाः - गृहपत्नी घर को घृत, दुग्ध आदि अमृत पदार्थों से परिपूर्ण रखकर सब कुटुम्बियों को स्वस्थ और पुष्ट रक्खे। और सब स्त्री-पुरुष धार्मिक, पुरुषार्थी तथा धनी होकर चोर-उचक्के सिंहादि दुष्टों से रक्षा करते हुए बस्ती को बसाये रक्खें ॥८॥ मनु भगवान् ने कहा है−सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया। सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया ॥ मनु० ५।१५०॥ स्त्री सदा प्रसन्नचित्त और घर के कामों में चतुर हो और (सुसंस्कृतोपस्करया) घर की सामग्री बासन-भाँडे भली-भाँति ठीक रखती हुई, व्यय करने में हाथ सकोड़ों रहे ॥
टिप्पणी: ८−(पूर्णम्)। पूरितम्। (नारि)। अ० १।११।१। हे नरस्य धर्म्ये हितकारिणि। (प्रभर)। हस्य भः। आहर। द्विकर्मकत्वात् (कुम्भम्, धाराम्)। इत्येतयोः कर्मता। (कुम्भम्)। म० ७। अपादाने द्वितीया। घटात्-इत्यर्थः। (एतम्)। (घृतस्य)। आज्यस्य। (धाराम्)। धृ-णिच्-अङ्, टाप्। सन्तत्या पतनम्। (अमृतेन)। मरणाद्रक्षकेण स्वास्थ्यवर्धकेन पदार्थसमूहेन। (संभृताम्)। संपादिताम्। (इमाम्)। (पातॄन्)। पा पाने, पा रक्षणे वा-तृच्। पानकर्तॄन्। रक्षकान्। (सम्)। सम्यक्। (अङ्ग्धि)। अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु-लोट् म्रक्ष, संयोजय। (इष्टापूर्तम्)। अ० २।१२।४। यज्ञवेदाध्ययनान्नदानादि पुण्यकर्म। (अभि)। सर्वतः। (रक्षाति)। लेट्। रक्षेत् ॥