देवता: इन्द्राग्नी, आयुः, यक्ष्मनाशनम्
ऋषि: ब्रह्मा, भृग्वङ्गिराः
छन्द: अनुष्टुप्
स्वर: दीर्घायुप्राप्ति सूक्त
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग नाश करने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राणापानौ) हे श्वास-प्रश्वास ! (युवम्) तुम दोनों (इह एव) इसमें ही (स्तम्) रहो, (इतः) इससे (मा अप गातम्) दूर मत जाओ। (अस्य) इस [प्राणी] के (शरीरम्) शरीर और (अङ्गानि) अङ्गों को (जरसे) स्तुति के लिये (पुनः) अवश्य (वहतम्) तुम दोनों ले चलो ॥६॥
भावार्थभाषाः - प्राण और अपान वायु का संचार ठीक न होने से रुधिर जमकर रोग उत्पन्न होता है, इससे मनुष्य सब शरीर में वायु संचार ठीक रखकर दृढ़ शरीरवाले हों और स्तुति प्राप्त करें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(इह एव)। अस्मिन्नेव शरीरे। (स्तम्)। भवतम्। (प्राणापानौ)। श्वासप्रश्वासौ। (मा अप गातम्)। इण् गतौ-माङि लुङ्। माप गच्छतम्। (इतः)। अस्माच्छरीरात्। (युवम्)। युवाम्। (शरीरम्)। अ० २।१२।८। कायम्। (अस्य)। पुरुषस्य। (अङ्गानि)। देहावययवान्। (जरसे)। अ० १।३०।२। जृ स्तुतौ, यद्वा, गृ शब्दे=स्तुतौ-असुन्। गस्यजः। स्तुत्यर्थम्। (वहतम्)। युवां प्रापयतम्। (पुनः) अवधारणे ॥
