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मु॒ञ्चामि॑ त्वा ह॒विषा॒ जीव॑नाय॒ कम॑ज्ञातय॒क्ष्मादु॒त रा॑जय॒क्ष्मात्। ग्राहि॑र्ज॒ग्राह॒ यद्ये॒तदे॑नं॒ तस्या॑ इन्द्राग्नी॒ प्र मु॑मुक्तमेनम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मुञ्चामि । त्वा । हविषा । जीवनाय । कम् । अज्ञातऽयक्ष्मात् । उत । राजऽयक्ष्मात् । ग्राहि: । जग्राह । यदि । एतत् । एनम् । तस्या: । इन्द्राग्नी इति । प्र । मुमुक्तम् । एनम् ॥११.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:11» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रोग नाश करने के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे प्राणी !] (त्वा) तुझको (हविषा) भक्ति के साथ (कम्) सुख से (जीवनाय) जीवन के लिए (अज्ञातयक्ष्मात्) अप्रकट रोग से (उत) और (राजयक्ष्मात्) राज रोग से (मुञ्चामि) मैं छुड़ाता हूँ। (यदि) जो (ग्राहिः) जकड़नेवाली पीड़ा [गठियारोग] ने (एतत्) इस समय में (एनम्) इस प्राणी को (जग्राह) पकड़ लिया है, (तस्याः) उस [पीड़ा] से (इन्द्राग्नी) हे सूर्य और अग्नि ! (एनम्) इस [प्राणी] को (प्र मुमुक्तम्) तुम छुड़ाओ ॥१॥
भावार्थभाषाः - सद्वैद्य गुप्त और प्रकट रोगों से विचारपूर्वक रोगी को अच्छा करता है, ऐसे ही प्रत्येक मनुष्य (इन्द्राग्नी) सूर्य और अग्नि अर्थात् सूर्य से लेकर अग्नि पर्यन्त अर्थात् दिव्य और पार्थिव सब पदार्थों से उपकार लेकर, अथवा सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी विद्वानों से मिलकर, अपने दोषों को मिटाकर यशस्वी होवे ॥१॥ इस मन्त्र का मिलान अथर्व० का० २ सू० ९ मं० १ से करो ॥ मन्त्र १-४ ऋग्वेद १०।१६१।१-४ में कुछ भेद से और फिर अथर्व० २०।९६।६-९ में हैं। ऋग्वेद में इस सूक्त का ऋषिप्राजापत्यो यक्ष्मनाशनः और देवताराजयक्ष्मघ्नम् है ॥
टिप्पणी: १−(मुञ्चामि)। विश्लेषयामि। (त्वा)। प्राणिनम्। (हविषा)। आत्मदानेन। भक्त्या। उपायेन। (जीवनाय)। प्राणधारणाय। चिरकालयशोधारणाय-इत्यर्थः। (कम्)। अव्ययम्। सुखेन। (अज्ञातयक्ष्मात्)। अर्त्तिस्तुसुहु०। उ० १।१४०। इति यक्ष पूजायाम्-मन्। अलक्षितमहारोगात्। (राजयक्ष्मात्)। राजदन्तादिषु परम्। पा० २।२।३१। इति उपसर्जनस्य परत्वम्। यक्ष्माणं राजा राजयक्ष्मः, तस्मात्। क्षयरोगात्। (ग्राहिः)। अ० २।९।१। ग्रहणशीला पीडा। (जग्राह)। गृहीतवती। (यदि)। चेत्। (तस्याः)। ग्राह्याः सकाशात्। (इन्द्राग्नी)। सूर्याग्नी। दिव्यपार्थिवपदार्थाः, यद्वा। तद्वत् तेजस्वी विद्वान् पुरुषः। (प्र मुमुक्तम्)। मुचेर्विकरणस्य श्लुः। प्रमोचयतम्। (एनम्)। शरीरस्थं प्राणिनम् ॥