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आयम॑गन्त्संवत्स॒रः पति॑रेकाष्टके॒ तव॑। सा न॒ आयु॑ष्मतीं प्र॒जां रा॒यस्पोषे॑ण॒ सं सृ॑ज ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । अयम् । अगन् । सम्ऽवत्सर: । पति: । एकऽअष्टके । तव । सा । न: । आयुष्मतीम् । प्रऽजाम् । राय: । पोषेण । सम् । सृज ॥१०.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

पुष्टि बढ़ाने के लिये प्रकृति का वर्णन।

पदार्थान्वयभाषाः - (एकाष्टके) अकेली व्यापक रहनेवाली, वा अकेली भोजन स्थानशक्ति ! [प्रकृति] (अयम्) यह (संवत्सरः) यथावत् निवास देनेवाला, (तव) तेरा (पतिः) पति वा रक्षक [परमेश्वर] (आ अगन्) प्राप्त हुआ है। (सा) लक्ष्मी तू (नः) हमारेलिए (आयुष्मतीम्) बड़ी आयुवाली (प्रजाम्) प्रजा को (रायः) धन की (पोषेण) बढ़ती के साथ (संसृज) संयुक्त कर ॥८॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् साक्षात् कर लेते हैं कि परमेश्वर ही प्रकृति, जगत् सामग्री का स्वामी अर्थात् उसके अंशों का संयोजक और वियोजक है और प्रकृति के यथावत् प्रयोग से मनुष्य अपनी सन्तान सहित चिरंजीवी और धनी होते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(अयम्)। परिदृश्यमानः। (आ, अगत्)। गमेर्लुङ्। आगमत्। आगतः। (संवत्सरः)। म० २। सम्यक् निवासकः। (पतिः)। रक्षकः। (एकाष्टके)। म० ५। हे एकमात्रव्यापिके। एकमात्रभोजनस्थाने। (तव)। त्वदीयः। (सा नः)। इति गतं म० ॥३॥