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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
पुष्टि बढ़ाने के लिये प्रकृति का वर्णन।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रपुत्रे) हे सूर्य जैसे पुत्रवाली ! (सोमपुत्रे) हे चन्द्रमा जैसे पुत्रवाली ! [प्रकृति] तू (प्रजापतेः) प्रजारक्षक परमेश्वर के (दुहिता) कार्यों की पूर्ण करनेवाली (असि) है, (अस्माकम्) हमारे (कामान्) मनोरथों को (पूरय) पूर्ण कर, (नः) हमारी (हविः) भक्ति को (प्रति गृह्णाहि) स्वीकार कर ॥१३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने प्रकृति से सूर्य-चन्द्रादिलोक और बड़े-बड़े प्रतापी तथा उपकारी मनुष्य उत्पन्न किये हैं, उस प्रकृति की शक्तियों के ज्ञान और प्रयोग से संसार की भलाई चाहनेवाले पुरुष अपनी कामनायें पूरी करते हैं ॥१३॥ इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: १३−(इन्द्रपुत्रे)। इन्द्रवत्पुत्रो यस्यास्तादृशि। हे सूर्यवत्पुत्रयुक्ते। (सोमपुत्रे)। हे चन्द्रवत्पुत्रयुक्ते प्रकृते ! (दुहिता)। नप्तृनेष्टृत्वष्टृ०। उ० २।९५। इति दुह प्रपूरणे-तृच्। दुहिता दुर्हिता दूरे हिता दोग्धेर्वा-निरु० ३।४। पिता दुहितुर्गर्भं दधाति पर्जन्यः पृथिव्याः-निरु० ४।२१। अत्र पृथिव्येव दुहितृशब्देनोक्ता, सा हि द्युलोकात् दूरे निहिता अथवा सा हि द्युलोकंदोग्धीति दुहिता-इति देवराजयज्वा तट्टीकायाम्। दोग्धि कार्याणि प्रपूरयतीति सा। कार्याणां प्रपूरयित्री। (असि)। भवसि। (प्रजापतेः)। प्रजानां मनुष्यादीनां रक्षकस्य परमेश्वरस्य। (कामान्)। मनोरथान्। (अस्माकम्)। (पूरय)। समर्धय। (प्रति)। (गृह्णाहि)। प्रतिगृहाण। स्वीकुरु। (नः)। अस्माकम्। (हविः)। आत्मदानम्। भक्तिम् ॥
