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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
युद्ध विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) प्रतापी सूर्य (सेनाम्) [शत्रु] सेना को (मोहयतु) व्याकुल कर दे। (मरुतः) दोषनाशक पवन के झोंके (ओजसा) बल से (घ्नन्तु) नाश कर दें। (अग्निः) अग्नि (चक्षूंषि) नेत्रों को (आ, दत्ताम्) निकाल देवे। [जिससे] (पराजिता) हारी हुई सेना (पुनः) पीछे (एतु) चली जावे ॥६॥
भावार्थभाषाः - युद्धकुशल सेनापति राजा अपनी सेना का व्यूह ऐसा करे जिससे उसकी सेना सूर्य, वायु और अग्नि वा बिजुली और जल के प्रयोगवाले अस्त्र, शस्त्र, विमान, रथ, नौकादि के बल से शत्रुसेना को नेत्रादि से अङ्ग-भङ्ग करके सर्वदा हराकर भगा दे ॥६॥
टिप्पणी: ६−(इन्द्रः) प्रतापी सूर्यः। (मरुतः। दोषनाशका वायुवेगाः। (घ्नन्तु)। हन-लोट्। नाशयन्तु। (ओजसा)। शस्त्रास्त्रादीनां बलेन। (चक्षूंषि)। अक्षीणि। नेत्राणि। (अग्निः)। अग्निप्रयोगः। (आ, दत्ताम्)। अपहरतु। (पुनः)। पश्चात्। निवर्त्य। (एतु) गच्छतु। (पराजिता)। पराभूता सती। अन्यत् सुगमं व्याख्यातं च ॥
