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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
युद्ध विद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले राजन् ! (अमित्राणाम्) शत्रुओं की (सेनाम्) सेना को (मोहय) व्याकुल कर दे। (अग्नेः) अग्नि के और (वातस्य) पवन के (ध्राज्या) झोंके से (विषूचः) सब ओर फिरनेवाले (तान्) चोरों को (वि, नाशय) नाश कर डाल ॥५॥
भावार्थभाषाः - राजा अपनी सेना के बल से शत्रुसेना को जीते और जैसे दावानल वन को भस्म करता और प्रचण्ड वायु वृक्षादि को गिरा देता है, वैसे ही विघ्नकारी बैरियों को मिटाता रहे ॥५॥ इस मन्त्र का दूसरा आधा अ० ३।२।३। में आया है ॥
टिप्पणी: ५−(इन्द्र)। हे परमैश्वर्य राजन्। (सेनाम्)। चमूम्। पृतनाम्। (मोहय)। मूढां कुरु। (अमित्राणाम्)। म० ३। पीडकानां शत्रूणाम्। (अग्नेः)। पावकस्य। (वातस्य)। पवनस्य। (ध्राज्या)। वसिवपियजि०। उ० ४।१२५। इति ध्रज गतौ-इञ्। वेगगत्या। (तान्)। म० ३। चोरान्। (विषूचः)। विषु+अञ्चु-क्विन्। जसि (प्रतीचः) इति शब्दवत् सिद्धिः-म० ४। सर्वतः प्राप्तान्। (वि, नाशय)। विध्वंसय ॥
