यदि॑ क्षि॒तायु॒र्यदि॑ वा॒ परे॑तो॒ यदि॑ मृ॒त्योर॑न्ति॒कं नीत ए॒व। तमा ह॑रामि॒ निरृ॑तेरु॒पस्था॒दस्पा॑र्शमेनं श॒तशा॑रदाय ॥
पद पाठ
यदि । क्षितऽआयु: । यदि । वा । पराऽइत: । यदि । मृत्यो: । अन्तिकम् । निऽइत: । एव ॥ तम् । आ । हरामि । नि:ऽऋते: । उपऽस्थात् । अस्पार्शम् । एनम् । शतऽशारदाय ॥९६.७॥
अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:96» पर्यायः:0» मन्त्र:7
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदि) चाहे [यह] (क्षितायुः) टूटी आयुवाला (यदि वा) अथवा (परेतः) अङ्गभङ्ग है, (यदि) चाहे, (मृत्योः) मृत्यु के (अन्तिकम्) समीप (एव) ही (नीतः=नि-इतः) आ चुका है। (तम्) उसको (निर्ऋतेः) महामारी की (उपस्थात्) गोद से (आ हरामि) लिये आता हूँ, (एनम्) इसको (शतशारदाय+जीवनाय) सौ शरद् ऋतुओंवाले [जीवन] के लिये (अस्पार्शम्) मैंने छुआ है ॥७॥
भावार्थभाषाः - जैसे चतुर वैद्य यत्न करके भारी-भारी रोगियों को चंगा करता है, ऐसे ही मनुष्य शरीरिक, आत्मिक और सामाजिक कठिन संकट पड़ने पर अपने आत्मा को प्रबल रक्खे ॥७॥
टिप्पणी: ७−(अस्पार्शम्) स्पृष्टवानस्मि। अन्यद् गतम् ॥
