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मु॒ञ्चामि॑ त्वा ह॒विषा॒ जीव॑नाय॒ कम॑ज्ञातय॒क्ष्मादु॒त रा॑जय॒क्ष्मात्। ग्राहि॑र्ज॒ग्राह॒ यद्ये॒तदे॑नं॒ तस्या॑ इन्द्राग्नी॒ प्र मु॑मुक्तमेनम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मुञ्चामि । त्वा । हविषा । जीवनाय । कम् । अज्ञातयक्ष्मात् । उत । राजऽयक्ष्मात् ॥ ग्राहि: । जग्राह । यदि । एतत् । एनम् । तस्या: । इन्द्रग्नी इति । प्र । मुमुक्तम् । एनम् ॥९६.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:96» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रोग नाश करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे प्राणी !] (त्वा) तुझको (हविषा) भक्ति के साथ (कम्) सुख से (जीवनाय) जीवन के लिये (अज्ञातयक्ष्मात्) अप्रकट रोग से (उत) और (राजयक्ष्मात्) राजरोग से (मुञ्चामि) मैं छुड़ाता हूँ। (यदि) जो (ग्राहिः) जकड़नेवाली पीड़ा [गठिया रोग] ने (एतत्) इस समय (एनम्) इस प्राणी को (जग्राह) पकड़ लिया है, (तस्याः) उस [पीड़ा] से, (इन्द्राग्नी) हे सूर्य और अग्नि (एनम्) इस [प्राणी] को (प्र मुमुक्तम्) तुम छुड़ाओ ॥६॥
भावार्थभाषाः - सद्वैद्य गुप्त और प्रकट रोगों से विचारपूर्वक रोगी को अच्छा करता है, ऐसे ही प्रत्येक मनुष्य (इन्द्राग्नी) सूर्य और अग्नि अर्थात् सूर्य से लेकर अग्निपर्यन्त अर्थात् दिव्य और पार्थिव सब पदार्थों से उपकार लेकर, अथवा सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी विद्वानों से मिलकर, अपने दोषों को मिटाकर यशस्वी होवें ॥६॥
टिप्पणी: मन्त्र ६-९ आचुके हैं-अ० ३।११।१-४ ॥ ६-९−व्याख्याताः-अ० ३।११।१-४ ॥