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अ॒न्त्रेभ्य॑स्ते॒ गुदा॑भ्यो वनि॒ष्ठोरु॒दरा॒दधि॑। यक्ष्मं॑ कु॒क्षिभ्यां॑ प्ला॒शेर्नाभ्या॒ वि वृ॑हामि ते ॥
पद पाठ
आन्त्रेभ्य: । ते । गुदाभ्य: । वनिष्ठो: । उदरात् । अधि ॥ यक्ष्मम् । कुक्षिऽभ्याम् । प्लाशे: । नाभ्या: । वि । वृहामि । ते ॥९६.२०॥
अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:96» पर्यायः:0» मन्त्र:20
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शारीरिक विषय में शरीररक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) तेरी (आन्त्रेभ्यः) आँतों से, (गुदाभ्यः) गुदा की नाड़ियों से, (वनिष्ठोः) वनिष्ठु [भीतरी मलस्थान] से, (उदरात् अधि) उदर में से, और (ते) तेरी (कुक्षिभ्याम्) दोनों कोखों से, (प्लाशेः) प्लाशि [कोख में की थैली] से, और (नाभ्याः) नाभि में से (यक्ष्मम्) क्षयी रोग को (वि वृहामि) मैं उखाड़े देता हूँ ॥२०॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में उदर के अवयवों का वर्णन है। भावार्थ मन्त्र १७ के समान है ॥२०॥
टिप्पणी: १७-२३−व्याख्याताः-अ० २।३३।१-७ ॥
