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हृद॑यात्ते॒ परि॑ क्लो॒म्नो हली॑क्ष्णात्पा॒र्श्वाभ्या॑म्। यक्ष्मं॒ मत॑स्नाभ्यां प्ली॒ह्नो य॒क्नस्ते॒ वि वृ॑हामसि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हृदयात् । ते । परि । क्लोम्न: । हलीक्ष्णात् । पार्श्वाभ्याम् ॥ यक्ष्मम् । मतस्नाभ्याम् । प्लीह्न: । यक्न: । ते । वि । वृहामसि ॥९६.१९॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:96» पर्यायः:0» मन्त्र:19


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

शारीरिक विषय में शरीररक्षा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) तेरे (हृदयात्) हृदय से, (क्लोम्नः) फेफड़े से, (हलीक्ष्णात्) पित्ते से, (पार्श्वाभ्यां परि) दोनों काँखों [कक्षाओं] से और (ते) तेरे (मतस्नाभ्याम्) दोनों मतस्नों [गुर्दों] से, (प्लीह्नः) प्लीहा वा पिलई [तिल्ली] से, (यक्नः) यकृत् [काल खण्ड वा कलेजा] से (यक्ष्मम्) क्षयी रोग को (वि वृहामसि) हम उखाड़े देते हैं ॥१९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में कन्धों के नीचे के अवयवों का वर्णन है। भावार्थ मन्त्र १७ के समान है ॥१९॥
टिप्पणी: १७-२३−व्याख्याताः-अ० २।३३।१-७ ॥