अ॒क्षीभ्यां॑ ते॒ नासि॑काभ्यां॒ कर्णा॑भ्यां॒ छुबु॑का॒दधि॑। यक्ष्मं॒ शीर्ष॒ण्यं म॒स्तिष्का॑ज्जि॒ह्वाया॒ वि वृ॑हामि ते ॥
पद पाठ
अक्षीभ्याम् । ते । नासिकाभ्याम् । कर्णाभ्याम् । छुबुकात् । अधि ॥ यक्ष्मम् । शीर्षण्यम् । मस्तिष्कात् । जिह्वाया: । वि । वृहामि । ते ॥९६.१७॥
अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:96» पर्यायः:0» मन्त्र:17
0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शारीरिक विषय में शरीररक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे प्राणी !] (ते) तेरी (अक्षीभ्याम्) दोनों आँखों से, (नासिकाभ्याम्) दोनों नथनों से, (कर्णाभ्याम्) दोनों कानों से, (छुबुकात् अधि=चुबुकात् अधि) ठोड़ी में से, (ते) तेरे (मस्तिष्कात्) भेजे से और (जिह्वायाः) जिह्वा से (शीर्षण्यम्) शिर में के (यक्ष्मम्) क्षयी [क्षयी रोग] को (वि वृहामि) मैं उखाड़े देता हूँ ॥१७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में शिर के अवयवों का वर्णन है। जैसे सद्वैद्य उत्तम औषधों से रोगों की निवृत्ति करता है, ऐसे ही मनुष्य अपने आत्मिक और शारीरिक दोषों को विचारपूर्वक नाश करे ॥१७॥
टिप्पणी: मन्त्र १७-२३ आ चुके हैं-अ० २।३३।१-७ ॥ १७-२३−व्याख्याताः-अ० २।३३।१-७ ॥
