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यस्त्वा॒ स्वप्ने॑न॒ तम॑सा मोहयि॒त्वा नि॒पद्य॑ते। प्र॒जां यस्ते॒ जिघां॑सति॒ तमि॒तो ना॑शयामसि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

य: । त्वा । स्वप्नेन । तमसा । मोहयित्वा । निऽपद्यते ॥ प्रजाम् । य: । ते । जिघांसति । तम् । इत: । नाशयामसि ॥९६.१६॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:96» पर्यायः:0» मन्त्र:16


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

गर्भरक्षा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे स्त्री !] (यः) जो कोई [दुष्ट] (स्वप्नेन) नींद से [अथवा] (तमसा) अंधेरे से (मोहयित्वा) घबड़ा देकर (त्वा) तेरे पास (निपद्यते) आजावे, और (यः) जो कोई (ते) तेरे (प्रजाम्) सन्तान को (जिघांसति) मारना चाहे, (तम्) उस [दुष्ट] को (इतः) यहाँ से (नाशयामसि) हम नाश करें ॥१६॥
भावार्थभाषाः - जो कोई दुष्ट जन नींद की औषधि से अथवा अंधेरा करके कुछ हानि करे, उसका नाश करना चाहिये ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(यः) दुष्टः (त्वा) त्वाम् (स्वप्नेन) निद्रौषधेन (तमसा) अन्धकारेण (मोहयित्वा) मूढां कृत्वा (निपद्यते) अभिगच्छति। अन्यत् पूर्ववत् ॥