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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गर्भरक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे गर्भिणी !] (यः) जो कोई [रोग] (तेरे) तेरे [गर्भाशय में] (पतयन्तम्) गिरते हुए [वीर्यरूप गर्भ] को और (निषत्स्नुम्) जमते हुए [अंकुए अर्थात् बालक] को और (यः) जो कोई [रोग] (सरीसृपम्) डोलते हुए गर्भ को (हन्ति) नाश करे, और (यः) जो कोई [रोग] (ते) तेरे (जातम्) उत्पन्न हुए बच्चे को (जिघांसति) मारना चाहे, (तम्) उस [रोग] को (इतः) यहाँ से (नाशयामसि) हम नाश करें ॥१३॥
भावार्थभाषाः - उत्तम वैद्यों द्वारा रोगों का नाश करके गर्भ और उत्पन्न हुए बच्चे की रक्षा करनी चाहिये ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(यः) रोगः (ते) तव गर्भाशये (हन्ति) नाशयति (पतयन्तम्) पतन्तं वीर्यरूपगर्भम् (निषत्स्नुम्) ग्लाजिस्थश्च क्स्नुः। पा० ३।२।१३९। नि+षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु-क्स्नु ग्स्नु वा। निषीदन्ते गर्भम् (यः) रोगः (सरीसृपम्) अ० ३।१०।६। सृपेर्यङ्लुगन्तात् पचाद्यच्। सर्पणशीलं गर्भम् (जातम्) दशसु मासेषूत्पन्नं गर्भम् (यः) रोगः (ते) तव (जिघांसति) हन्तुमिच्छति (तम्) रोगम् (इतः) अस्मात् स्थानात् (नाशयामसि) नाशयामः ॥
