आहा॑र्ष॒मवि॑दं त्वा॒ पुन॒रागाः॒ पुन॑र्णवः। सर्वा॑ङ्ग॒ सर्वं॑ ते॒ चक्षुः॒ सर्व॒मायु॑श्च तेऽविदम् ॥
पद पाठ
आ । आहार्षम् । अविदम् । त्वा । पुन: । आ । अगा: । पुन:ऽनव: ॥ सर्वऽअङ्ग । सर्वम् । ते । चक्षु: । सर्व । आयु: । च । ते । अविदम् ॥९६.१०॥
अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:96» पर्यायः:0» मन्त्र:10
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग नाश करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्य !] (त्वा) तुझको (आ अहार्षम्) मैंने ग्रहण किया है और (अविदम्) मैंने पाया है, तू (पुनर्णवः) नवीन होकर (पुनः) फिर (आ अगाः) आया है। (सर्वाङ्ग) हे सम्पूर्ण [विद्या] के अङ्गवाले ! (तेरे) लिये (सर्वम्) सम्पूर्ण (चक्षुः) दर्शनसामर्थ्य (च) और (ते) तेरे लिये (सर्वम्) सम्पूर्ण (आयुः) आयु (अविदत्) मैंने पायी है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जिस पुरुष को आचार्य स्वीकार करके विद्यादान देकर द्विजन्मा बनाता है, वह सब प्रकार विद्या से प्रकाशित होकर उत्तम जीवनयुक्त होता है ॥१०॥
टिप्पणी: यह मन्त्र आचुका है-अ० ८।१।२० ॥ १०−अयं व्याख्यातः-अ० ८।१।२० ॥
