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देवता: इन्द्रः ऋषि: कृष्णः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: सूक्त-९४

गोभि॑ष्टरे॒माम॑तिं दु॒रेवां॒ यवे॑न॒ क्षुधं॑ पुरुहूत॒ विश्वा॑म्। व॒यं राज॑भिः प्रथ॒मा धना॑न्य॒स्माके॑न वृ॒जने॑ना जयेम ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

गीभि: । तरेम । अमतिम् । दु:ऽएवाम् । यवेन । क्षुधम् । पुरुऽहूत । विश्वाम् ॥ वयम् । राजऽभि: । प्रथमा: । धनानि । अस्माकेन । वृजनेन । जयेम ॥९४.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:94» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुहूत) हे बहुतों से बुलाये गये ! [राजन्] (गोभिः) विद्याओं से (दुरेवाम्) दुर्गतिवाली (अमतिम्) कुमति [वा कङ्गाली] को और (यवेन) अन्न से (विश्वाम्) सब (क्षुधम्) भूख को (तरेम) हम हटावें। (वयम्) हम (राजभिः) राजाओं के साथ (प्रथमाः) प्रथम श्रेणीवाले होकर (धनानि) अनेक धनों को (अस्माकेन) अपने (वृजनेन) बल से (जयेम) जीतें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य प्रयत्न करके विद्याओं द्वारा कुमति और निर्धनता हटाकर भोजन पदार्थ प्राप्त करें और अपने भुज बल से महाधनी होकर राजाओं के साथ प्रथम श्रेणीवाले होवें ॥१०॥
टिप्पणी: मन्त्र १०, ११ आचुके हैं-अ० २०।१७।१०, ११। और कुछ भेद से-२०।८९।१०, ११ ॥ १०, ११−मन्त्रौ व्याख्यातौ-अ० २०।१७।१०, ११ ॥