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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमेश्वर] (ओजसा) पराक्रम से (वज्रम्) वज्र को (शिशानः) तीक्ष्ण करता हुआ (त्वम्) तू (सजोषसम्) प्रीतियुक्त [वा विचारवान्] (अर्कम्) पूजनीय विद्वान् को (बाह्वोः) दोनों भुजाओं पर [जैसे] (बिभर्षि) धारण करता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा दुष्टों का नाश करता हुआ आज्ञाकारी विचारशील विद्वानों को अपने प्रेम की गोद में बिठाकर बढ़ाता है ॥७॥
टिप्पणी: ७−(त्वम्) (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (सजोषसम्) प्रीत्या विचारेण वा सह वर्तमानम् (अर्कम्) पूजनीयं पण्डितम् (बिभर्षि) धारयसि (बाह्वोः) भुजयोः (वज्रम्) (शिशानः) निश्यन्। तीक्ष्णीकुर्वन् (ओजसा) पराक्रमेण ॥७॥
