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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (त्वम्) तू (बलात्) बल से, (ओजसः) पराक्रम [धैर्य] और (सहसः) जयशीलता से (अधि) अधिक करके (जातः) प्रसिद्ध है। (वृषन्) हे बलवान् ! (त्वम्) तू (वृषा इत्) बलवान् ही (असि) है ॥॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अपने अनन्त सामर्थ्य से सबको अपने वश में रखता है ॥॥
टिप्पणी: यह मन्त्र कुछ भेद से सामवेद में भी है-पू० २।३।६ ॥ −(त्वम्) (इन्द्र) (बलात्) (अधि) अधिकृत्य (सहसः) अभिभवनात्। जयशीलत्वात् (जातः) प्रसिद्धः (ओजसः) पराक्रमात्। धैर्यात् (त्वम्) (वृषन्) हे बलवन् (वृषा) बलवान् (इत्) एव (असि) ॥
