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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ईङ्खयन्तीः) चेष्टा करती हुई, (अपस्युवः) काम चाहनेवाली, (सुवीर्यम्) बड़े सामर्थ्य को (भेजानासः) सेवन करती हुई प्रजाएँ (जातम्) प्रकट हुए (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा] की (उप आसते) उपासना करती हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - यह सब पदार्थ परमेश्वर के नियम से चेष्टा करते हुए और अपने कर्तव्य करते हुए उस जगदीश्वर की आज्ञा में रहते हैं ॥४॥
टिप्पणी: मन्त्र ४-८ ऋग्वेद में हैं १०।१३।१- मन्त्र ४ सामवेद पू० २।९।१ ॥ ४−(ईङ्खयन्तीः) ईखि गतौ-शतृ। गच्छन्त्यः। चेष्टमानाः (अपस्युवः) अपः कर्मात्मन इच्छन्त्यः (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं परमात्मानम् (जातम्) प्रादुर्भूतम् (उप आसते) परिचरन्ति (भेजानासः) छान्दसं रूपम्। भजमानाः (सुवीर्यम्) शोभनं बलम् ॥
